1993-94 की बात है, तब स्कूल जाने की तत्कालीन उम्र 5 वर्ष हुआ करती थी तो पारंपरिक तौर पर अपने बुआ जी के विद्यालय में जाना होता था....कई बदलाव कर दिया गया है लेकिन बावजूद इसके, उन्ही बरामदों के किसी कोने में छुपा हुआ मेरा बचपन आज मुझे निहार रहा था।

कितना जल्दी गुज़र जाता है वक़्त, कितनी दौड़ लगायी होंगी हमने, कितने इमली, चन्ने और समोसे खरीद कर खाये होंगे।

चप्पा चप्पा चरखा चले कि जगह जगह कब डीजी वाले बाबू ने ले ली पता ही नहीं चला। पता ही नहीं चला पिताजी के कुछ एक सफेद बाल कब अपना आधिपत्य जमा लिये.... कभी कभी तो लगता है ये वक़्त बहुत बेरहम है अपने साथ क्या क्या ले जाता है...किसी का बचपन तो किसी की जवानी।

वैदिक बाल विद्यालय में हरे और सफेद रंग का यूनिफार्म हुआ करता था कभी हमारा आधिकारिक तौर पर वहाँ दाखिला तो नही हुआ लेकिन स्कूल जाने की आदत वहीं पर पड़ी। कभी कभी सोचता हूँ विद्यालय के दीवारों से अगर बातें होतीं तो पूछता उनसे....की क्या बदल गया है?

क्या तब भी माथे पर इतनी ही शिकन हुआ करती थी?

क्या बदला है, बताओ तो!

आज के 2020 में 1996 को ढूंढते हुए निकला था, मुझे आज भी याद आ रहा था उन सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ एक छोटा मैं, राज और उसके मित्रों की टोली कभी आईश-पाइस, रंग भरी बाल्टी, विष-अमृत खेलते थे।

बलिया दिल्ली से उस वक़्त इतना दूर था की आई-स्पाई बलिया आते-2 आईश-पाइस हो जाया करता था।

अंग्रेजों और अंग्रेजी का हमने अपने बचपन में जो नुक्सान किया है, वो काबिले तारीफ है। 😂

सब मिलाकर कुछ यादें ताजा हुईं, कुछ लोग याद आये तो कुछ किस्से दोहराये गये, अब बचपन में जवानी की तरह चाकू से काटकर कहीं नाम लिखे होते तो कुछ होता जो देख पाते....दिखा पाते। 😂

— आलोक

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